Paheliyan in Hindi: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक दिलचस्प पहेली खूब चर्चा में है, जो बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को सोचने पर मजबूर कर रही है। सवाल है – “रात में रोती है, दिन में सोती है, बताओ क्या?” यह पहेली सुनने में जितनी आसान लगती है, इसका उत्तर उतना ही रोचक है। पहेलियाँ भारतीय संस्कृति का पुराना हिस्सा रही हैं और डिजिटल दौर में भी इनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है। व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक पोस्ट और इंस्टाग्राम रील्स में यह पहेली बार-बार दिखाई दे रही है।
पहेलियाँ केवल समय बिताने का साधन नहीं होतीं, बल्कि ये हमारे दिमाग को सक्रिय रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। ये तर्कशक्ति को मजबूत करती हैं और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं। खासकर बच्चों के मानसिक विकास में पहेलियों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब हम किसी पहेली को हल करने की कोशिश करते हैं, तो हमारा दिमाग कई संभावनाओं पर विचार करता है, जिससे बौद्धिक क्षमता मजबूत होती है। आइए जानते हैं इस वायरल पहेली का सही जवाब और इसके पीछे छिपा तर्क।
पहेली का सही उत्तर
“रात में रोती है, दिन में सोती है” इस पहेली का सही जवाब है – मोमबत्ती।
यह उत्तर सुनकर अधिकतर लोग हैरान रह जाते हैं, क्योंकि वे किसी कठिन या अनोखे जवाब की उम्मीद कर रहे होते हैं। जबकि असल उत्तर हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ा हुआ है।
मोमबत्ती आज भी एक आम घरेलू वस्तु है। भले ही अब बिजली लगभग हर जगह उपलब्ध है, फिर भी बिजली चले जाने पर या पूजा-पाठ जैसे धार्मिक कार्यों में मोमबत्ती का उपयोग किया जाता है। इस पहेली की खास बात यह है कि यह एक साधारण चीज़ को कल्पनाशील और काव्यात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत करती है।
“रोने” और “सोने” का तर्क
मोमबत्ती के “रोने” से आशय उसके पिघलते मोम से है। जब मोमबत्ती जलती है, तो उसकी गर्मी से मोम पिघलकर बूंदों के रूप में नीचे गिरता है। यह दृश्य बिल्कुल आँसुओं जैसा लगता है, इसलिए कहा जाता है कि मोमबत्ती रात में रोती है। यह तुलना बहुत सुंदर और रचनात्मक है।
दिन के समय सूरज की रोशनी पर्याप्त होती है, इसलिए मोमबत्ती की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसे में वह बिना उपयोग के एक जगह पड़ी रहती है, जैसे सो रही हो। यही कारण है कि कहा जाता है कि मोमबत्ती दिन में सोती है। बच्चों को यह तर्क समझाना आसान होता है, और यही वजह है कि यह पहेली लंबे समय से प्रचलित है।
पहेलियों से मानसिक स्वास्थ्य को होने वाले लाभ
पहेलियाँ सुलझाना दिमाग के लिए एक अच्छा व्यायाम है। जब हम किसी पहेली पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क अलग-अलग विचारों और संभावनाओं पर काम करता है। इससे दिमाग की सक्रियता बढ़ती है और याददाश्त भी मजबूत होती है। कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि जो लोग नियमित रूप से पहेलियाँ हल करते हैं, उनकी सोचने की क्षमता बेहतर होती है।
इसके अलावा, पहेलियाँ तनाव कम करने में भी सहायक होती हैं। जब हम किसी पहेली का सही उत्तर खोज लेते हैं, तो दिमाग में खुशी से जुड़ा रसायन निकलता है, जिससे अच्छा महसूस होता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ भी मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए पहेलियाँ और पजल्स हल करने की सलाह देते हैं। यह रोज़मर्रा की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में एक सकारात्मक ब्रेक की तरह काम करता है।
भारतीय संस्कृति में पहेलियों की भूमिका
भारत में पहेलियों की परंपरा बहुत पुरानी है। प्राचीन काल से ही पहेलियाँ ज्ञान, बुद्धिमत्ता और मनोरंजन का माध्यम रही हैं। वैदिक साहित्य और लोककथाओं में भी पहेलियों का उल्लेख मिलता है। अमीर खुसरो जैसे महान कवियों ने पहेलियों को साहित्यिक ऊँचाई तक पहुँचाया।
ग्रामीण इलाकों में आज भी शाम के समय बड़े-बुजुर्ग बच्चों से पहेलियाँ पूछते हैं। इससे न सिर्फ मनोरंजन होता है, बल्कि पीढ़ियों के बीच जुड़ाव भी बना रहता है। दादी-नानी की कहानियों के साथ पहेलियाँ हर भारतीय बच्चे की यादों का हिस्सा रही हैं। आज भले ही पहेलियाँ मोबाइल और सोशल मीडिया तक सीमित हो गई हों, लेकिन इनका आकर्षण अब भी बरकरार है।
कुछ और मशहूर हिंदी पहेलियाँ
“एक राजा की अनोखी रानी, दुम के बल पर पीती पानी” – इस प्रसिद्ध पहेली का उत्तर दीया है। दीया अपनी बाती के सहारे तेल खींचता है, जो पानी पीने जैसा प्रतीत होता है।
इसी तरह “गोल है लेकिन बॉल नहीं, नाचता है लेकिन डॉल नहीं” का उत्तर लट्टू है।
एक और जानी-पहचानी पहेली है – “कटते हैं, पिसते हैं, पर खाए नहीं जाते”, जिसका जवाब ताश के पत्ते हैं। ऐसी पहेलियाँ हमें यह सिखाती हैं कि साधारण चीज़ों को अलग नजरिए से कैसे देखा जाए। बच्चों के लिए ये न सिर्फ मज़ेदार होती हैं, बल्कि ज्ञानवर्धक भी होती हैं। कई शिक्षक कक्षा में बच्चों की रुचि बनाए रखने के लिए इनका उपयोग करते हैं।
शिक्षा और आधुनिक दौर में पहेलियाँ
आज के समय में कई स्कूल और शिक्षण संस्थान पहेलियों को पढ़ाई का हिस्सा बना रहे हैं। इससे बच्चों की कल्पनाशक्ति और समस्या सुलझाने की क्षमता विकसित होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी तार्किक पहेलियाँ पूछी जाती हैं, जिनका उद्देश्य उम्मीदवार की सोच और विश्लेषण क्षमता को परखना होता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी पहेली-आधारित ऐप्स तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। लाखों लोग इन्हें डाउनलोड कर रहे हैं क्योंकि ये मनोरंजन के साथ-साथ दिमागी विकास में भी मदद करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहेलियाँ सॉफ्ट स्किल्स और निर्णय लेने की क्षमता को बेहतर बनाने में भी सहायक होती हैं।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और मनोरंजन के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी सामान्य ज्ञान पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल ज्ञानवर्धन और मनोरंजन के रूप में लें। किसी भी शैक्षणिक या मनोवैज्ञानिक निर्णय के लिए विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।







